अमर शहीद राजा नरवर शाह राज गोंड – बुंदेला विद्रोह व 1857 क्रांति के गुमनाम नायक

अमर शहीद राजा नरवर शाह राजगोंड (१८१४-१८५८) तक…
राजा नरवर शाह का जन्म पुलशय (मरावी) राज गोंड वंशजों के केसली नरेश किशन शाह की शाखा में उन के पुत्र राजा ढोकल शाह से पुत्र राजा तरवर शाह से पुत्र राजा विमल शाह हुए। राजा ढोकल शाह ने सन 1703 मे ढिलवार किले का निर्माण किया था उस समय वे राम पुर के राजा अजित सिंह पीठहरा स्टेट के कुल सामंत थे।

लेकिन सन 1703 से 1785 तक पिटहैरा के राजा अजित सिंह राज गोंड ने अपने राज्य का खूब विस्तार किया जो गौर झामर से लेकर चौगान तक फैल गया उन्होंने। मराठी मोरा जी राव भोसले से संधि करके राज्य को विस्तृत बनाए रखा, जो उनके संबंधी राजा निजाम शाह गोंड, गढ़-मंडला नरेश को नही भाया और उन्होंने अपने सेना पति विश्राम शाह को आदेश देकर तेंदुखेड़ा के पास स्थित रामपुर पर आक्रमन कराया। विश्राम शाह एक कुशल योध्दा थे उन्होंने रामपुर में राजा अजित सिंह राज गोंड की हत्या कर दी और स्वयं मदनपुर के राजा के रूप में मंडला नरेश निजाम शाह द्वारा मदनपुर के राजा के पद पर अभीषिक्त हुए।

राजा ढोकल शाह को केसली जाना पड़ा बाद में वे सिंह पुर चले गए जहाँ उनके पुत्र तर वर शाह हुए। राजा तरवर शाह के पुत्र राजा विमल शाह हुए जिन्होंने अंग्रेजी शासन काल में सिंहपुर से चिचली पलायन किया और चिचली के राजा निजाम शाह जगेत के साथ रहे, जहाँ पर राजा नरवर शाह का जन्म हुआ। वे वहीं पले बढ़े।

राजा डेलन शाह की मुलाकात चीचली क्षेत्र के वीर नरवर शाह से हुई वे कुशल योद्धा थे अत: राजा डेलन शाह उन्हें अपने साथ मदनपुर ले आये। उनके बीच में गहरी मित्रता हो गई थी। लेकिन जब उन्हे ज्ञात हुआ की उनके पैतृक भूमि ढिलवार में है तो मदनपुर के गोंड राजा विश्राम शाह के पुत्र राजा डेलन शाह जी ने उन्हे ससम्मान  उनके पूर्वज भूमि उन्हे दिलाने का आसवाशन दिया।

उस समय सम्पुर्ण नरसिंह पुर क्षेत्र अंग्रेज गवर्नर कैपटन टर्नर के अधीन था। राजा डेलन शाह ने राजा नर वर शाह के साथ मिलकर एक विशाल क्रांतिकारी सेना का गठन कर 1842 के बुन्देला विद्रोह में अंग्रेजों के विरुद्ध संघर्ष किया। दोनों ने मिलकर पूरे नरसिंहपुर क्षेत्र से अंग्रेजी सत्ता को उखाड़ फेका जिसमे राजा नरवर शाह ढिलवार के किले पर पुन: अपने सत्ता स्थापित किए। ढिलवार के क्रांतिकारी राजा नरवर शाह ने  वे आसपास के क्षेत्रों में बहुत विख्यात थे। 1842 की क्रांति के दौरान 18 महीने अंग्रेजों को नरसिंहपुर में घुसने नहीं दिया था। राजा डेलन शाह ने भी चौगान किले को जीत कर 1842 से 1857 तक राज्य किए।

अगस्त 1857 को राजा डेलन शाह और नरवर शाह के नेतृत्व में भोपाल तथा सागर के विद्रोहियों ने तेंदूखेड़ा नगर तथा पुलिस थाने को लूटकर क्रांति की शुरुआत हुई। 18 नवम्बर 1857 को कैप्टन टर्नन ने राजा डेलन शाह नरवर शाह के ढिलवार स्थित किले में आग लगा दी। परंतु डेलन शाह और  नरवर शाह को पकड़ा नहीं जा सका वे जंगलों में छिप जाते थे। नरवर शाह का एक भतीजा पकड़ लिया गया और उसे फांसी पर लटका दिया गया।

9 जनवरी 1858 को राहतगढ़ और भोपाल से लगभग 4000 हजार विद्रोहियों ने जिनमें भोपाल के आदिल मोहम्मद खान, सागर के बहादुर सिंह और अन्य नेताओं के अधीन 250 घुड़सवार पठान और मदनपुर के डेलनशाह और नरवर सिंह शामिल थे, इन्होंने तेंदूखेड़ा पर पुनः आक्रमण किया 11 इस प्रकार 8 जनवरी में तेंदूखेड़ा पर 3000 या 4000 विद्रोहियों ने आक्रमण किया। इस दल ने तेंदूखेड़ा पर आक्रमण किया था 12 विद्रोही दल ने तेंदूखेड़ा तथा इमझिरा पर पुनः कब्जा कर लिया। तब नरवर शाह पर 1000 रुपिया का इनाम रखा गया लेकिन कोई सफलता नहीं मिली।

अनेक छुटपुट झड़पों के बाद धोखे से 16 मई, 1857 को नरवर शाह को अंग्रेजो द्वारा गिरफ्तार कर लिया गया। अंततः संघर्ष करते-करते इन्हें भी ब्रिटिश सरकार ने गिरफ्तार कर लिया। इन पर कार्यवाही करते हुए जेल में डाल दिया गया। नरवर शाह की मृत्यु जेल में ही हो गई। इस प्रकार यह वीर योद्धा भी अपनी मातृभूमि के खातिर शहीद हो गए। उस समय एक साल तक राजा डेलन शाह फरार रहे और चिखली में रहे 16 मई 1858 तक अंग्रेज  हुकूमत से लड़ते हुए बलिदान हुए।

हाल ही में उनके बलिदान का सम्मान करने के लिये आजादी का अमृत महोत्सव के अंतर्गत राजा नरवर शाह राजगोंड़ (ढिलवार) की मूर्ति को स्थापित किया गया। साथ ही शासकीय महाविद्यालय तेंदूखेड़ा का नाम 1842 की बुंदेला क्रांति तथा 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के मुख्य नायकों में ढिलवार के राजा नरवर शाह के नाम से रखा गया है।

जोहार
जय गोंडवाना🦁

संदर्भ –

लेखक राजकुमार लोधी की पुस्तक – नरसिंह पुर जिले में 1857 का विद्रोह
सुरेश मिश्र – गढ़ा का गोंड राज्य पुस्तक पृष्ठ संख्या (७४)
राज गोंड वंशावली गोरखपुर रियासत से संकलित

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